जरूरत हो न हो, हर मरीज की जांच कराकर चल रहा कमीशन का खेल
केन्द्रीय रेलवे अस्पताल में दवाईयां और उपकरण की खरीदी में लंबे समय से भ्रष्टाचार हो रहा है। इसे बढ़ावा देकर डॉक्टर अब एमआरआई के नाम पर जमकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। मरीज को इस जांच की आवश्यकता है अथवा नहीं यह जाने बगैर डॉक्टर जबरन एमआरआई करवाकर रेलवे को हर माह लाखों की चपत लगा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि केन्द्रीय रेल चिकित्सालय में वैसे तो कई सुविधाओं का अभाव है। एमआरआई और सीटी स्केन जांच के लिए रेल मरीजों को भोपाल, मुम्बई और प्राइवेट अस्पताल में रेफर कर रेल डॉक्टर खासा कमीशन कमा रहे हैं। केन्द्रीय अस्पताल में एमआरआई की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इस जांच के लिये प्रतिदिन 8 से 10 मरीजों को राइट टाउन स्थित दिल्ली एमआरआई सेंटर भेजने और एक मरीज की जांच 6 हजार रुपए में करने से रेलवे को जहां 10 मरीजों पर रोजाना 60 हजार का भुगतान एमआरआई सेन्टर को करना पड़ रहा है, वहीं इससे हर माह 18 लाख की क्षति हो रही है।
कमीशन का खेल : सूत्रों के अनुसार रेल चिकित्सालय में पदस्थ डॉक्टर अधिकांश मरीजों को जांच के लिये प्राइवेट अस्पताल रेफर करते हैं। जहां जांच की औपचारिकता कर अस्पताल और एमआरआई सेन्टर वाले मनमाफिक बिल बनाकर रेलवे से उसका भुगतान ले रहे हैं। वहीं इस तरह की जांच से रेल डॉक्टरों को 30-40 प्रतिशत कमीशन मिल रहा है जो उनके वेतन से कहीं ज्यादा होता है। सेन्ट्रल गवर्नमेंट हेल्थ सर्विस (सीजीएचएस) के मुताबिक रेलवे प्राइवेट अस्पतालों में जांच बिल का भुगतान करती है। एक मरीज की एमआरआई करवाने में जहां आम आदमी को 6-7 हजार रुपए खर्च आता है वहीं रेलवे के मरीजों के लिये यह जांच 17-18 सौ रुपए में की जाती है।
निजीकरण की नीति के चलते रेलवे को आर्थिक क्षति हो रही है। एमआरआई और सीटी स्केन की सुविधा केन्द्रीय चिकित्सालय में नहीं होने से मरीजों को यह जांच प्राइवेट में करवाना पड़ रहा है, जहां ऊंची फीस चुकाने से रेलवे को खासी क्षति हो रही है।